आज कल एक शब्द बहुत सुनने में आ रहा है, असहिष्णुता इस शब्द का आविष्कार तो हालांकि युगों पहले हो चुका था लेकिन प्रचलन में अभी कुछ ही समय पहले आया है, और गाहे बेगाहे इसका इस्तेमाल हो ही रहा है, लगता है जैसे की इस कि इस शब्द का पुनर्जन्म हुआ हो या फिर पता नहीं कहाँ से भटकता हुआ यहां की आबोहवा में फैलने की कोशिश कर रहा हो।
वैसे तो इस शब्द के मायने साधारण से हैं, लेकिन कुछ लोग इसको ऐसे असाधारण बनाने की जुगत में लगे हैं, मानो ये ऋषि दधीचि की अस्थियों से बना अजेय अस्त्र हो. कुछ लोग इसको चमका चमका कर अधिकतर लोगों को डराने की कोशिश में हैं, जिससे की उनकी दुकानदारी चलती रहे, इन कुछ लोगों की भभकियों के फेर में कुछ लोग आ भी जाते हैं, लेकिन अधिकतर लोगों को इस शब्द से कुछ फर्क नहीं पड़ता क्योंकी सहन करने की क्षमता हम लोगों को घुट्टी में पिलाई जाती है।
सैंकड़ों वर्षों से विदेशी आक्रमणकारी इस देश में आते रहे, लूटते रहे, और लूट लूट कर जाते रहे, लेकिन हमारी सहष्णुता देखो हमने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया बल्कि उनमे से कइयों को तो हमने अपने देश में बसने दिया और उनकी और हमारी संस्कृतियों को घुलमिल जाने दिया इस से बड़ी सहिष्णुता और क्या होगी।
आज भी देश में हम उन गिनती के लोगों को सहे जा रहे हैं जो असहिष्णुता नामक ज़हर से इस देश की मिटटी को प्रदूषित करने की कोशश करने में लगे हैं।
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